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नदी की आत्मकथा पर निबंध

क्या आप भी नदी की आत्मकथा पर निबंध लिखना चाहते हैं तो आपके लिए यह पोस्ट एकदम सही है. इस पोस्ट में आज मैं आपको बताऊंगा कि नदी की आत्मकथा पर निबंध हिंदी में किस प्रकार लिखा जाए. नदी की आत्मकथा से अभिप्राय है कि नदी स्वयं को बया कर रही है यानी नदी अपने बारे में हमें बता रही है

तो इस विषय पर किस प्रकार एक शानदार निबंध लिखा जाए आज मैं आपको बताऊंगा. इस पोस्ट में मैंने आपको दो निबंध बताएं हैं आपको जो पसंद आये उसे आप अपने Competition के लिए लिख सकते हैं. तो आइए पढ़ते हैं

नदी की आत्मकथा पर निबंध 300 शब्दों में

नदी की आत्मकथा पर निबंध

मैं नदी हूँ लोग मुझे सरिता भी कहते हैं. मैं धरती की पुत्री हूँ भूमि की कोख से मेरा जन्म हुआ है. पर्वत की वर्फीली चोटियों से पिघलकर मैं झर-झर कर नदी बनती हूँ

मेरा रूप और आकार अक्सर बदलता रहता है. धरती से फलु या पहाड़ों से झरुँ मेरे पिता पर्वत मुझे अपनी गोद में झुलाते व दुलारते हैं

शुरू में मेरा आकार बड़ा पतला होता है. धीरे-धीरे मेरा विस्तार होता जाता है. मैं दो किनारों के बीच बहती हूँ मेरे किनारे पर हरे-भरे वृक्ष खड़े रहते हैं. उन पर बैठे पक्षी मधुर गीत गाते हैं

मुझे उनके वे गीत बड़े प्रिय लगते हैं. पशु-पक्षी मेरा मीठ पानी पीते है तो मुझे बहुत आनन्द आता है. मैं बचपन मे बहुत चंचल थी जिस कारण मै कभी भी एक जगह नही ठहरी मुझे रुकना पसंद नही निरंतर बहते जाना ही मेरा पर धर्म है

मुझे एक पल भी रुकना नही आता मुझे बस धीरे-धीरे आगे बढ़ना आता है और मैं यही काम निरंतर करती रहती हूँ. मैं केवल कर्म करने मै विश्वास रखती हूँ. मैं आप सभी को जीवन में निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हूं ताकि आप जीवन में ऊंचाइयों को हासिल करें

मैं इस जीवन को पाकर धन्य हूँ क्योकि मुझे हर प्राणी की सहायता करने का मौका मिलता है. लोग मेरी पूजा करते है, मुझे माँ कहते है, मुझे समान देते है और मेरे बहुत से नामकरण कर देते है जैसे गंगा, जमुना, सरस्वती, ब्रह्मपुत्र, यमुना आदि

खेतों में मेरा पानी ले जाकर फसलों की सिंचाई की जाती है. मैं पशु-पक्षी, पेड़-पौधों हर प्राणी की सेवा करती हूँ और किसी से कुछ नहीं मांगती

आजकल मुझ पर बड़े- बड़े बाँध बनाए जाते हैं. मेरे पानी से बिजली बनाई जाती है, नहरें निकाली जाती हैं

बिजली इंसानों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है जिसकी वजह से इंसान इतनी तरक्की कर पाया है. बिजली के कारण अधिक मानव के कार्य चल रहे हैं अगर बिजली नहीं होगी तो मानव बहुत ज्यादा पिछड़ जाएगा

मेरे इतने उपयोगी होने के बावजूद, मानव अभी भी मुझे दूषित करने की कोशिश कर रहा है. कारखानों का दूषित पानी, कचरा और प्लास्टिक मुझमें मनुष्यों द्वारा फेंका जाता है. जो मेरे पानी को दूषित कर रहा हैं

मै आशा करती हूँ की आप ऐसा न करे और मुझे स्वच्छ बनाने में अपनी भूमिका निभाए. मैं चाहती हूँ कि मेरी जलधारा सदैव बहती रहे और मैं सदैव धरती मां के चरणों में लहराती रहूं

मैं सभी मनुष्य, पशु-पक्षी, जीव-जंतुओं को सूखी बनाना चाहती हूँ. मानव सभ्यता मेरे तट पर ही फली-फूली है. मेरी बस यही इच्छा है कि मैं हमेशा निर्मल रहूँ आशा करती हूँ आप मुझे समझ पाए होंगे

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नदी की आत्मकथा पर निबंध 500 शब्दों में

नदी की आत्मकथा पर निबंध

“पर्वतों से निकलकर, सदा रहती हूं गतिमान
मैं नदी हूँ, प्राणीजगत का करती हूं कल्याण”

मैं नदी हूँ मनुष्य मुझे भिन्न भिन्न नामों से पुकारता है जैसे – नहर ,सरिता, तटिनी, पयस्विनी, तरनी, स्रोतस्विनी, प्रवाहिनी, नहर, सरिता, तटिनी, आदि. मैं बड़े ही चंचल स्वभाव की हूं. हर समय कल कल बहती रहती हूं. कभी रुकती ही नहीं हूं

मैं पर्वतों से निकलती हूँ. कभी झरने तो कभी नहर के रूप में अपनी राह बनाती निरन्तर गतिमान रहती हूं और सागर में जा मिलती हूँ. कभी तेज प्रवाह में बहती हूँ तो कभी धीमे, कहीं संकरी हो जाती हूँ तो कहीं पर चौड़ी कंकड़, पत्थर, चट्टानें साथ लिए बस चलती ही रहती हूं. झर-झर बहती ही रहती हूं

मां प्रकृति ने मुझे जनकल्याण हेतु उत्पन्न किया है. मैं बिना किसी स्वार्थ के सम्पूर्ण प्राणिजगत का कल्याण करती हूं. मैं जहां से भी होकर गुजरती हूँ सब हरा भरा करती जाती हूँ

मेरा नीर बहुत से जीवों को तृप्त करता है. मैं नए जीवन के जन्म का कारण बनती हूँ. अनेक जीव मुझमें ही पनपते हैं और मुझमें ही अपना जीवन चक्र व्यतीत करते हैं

ऐसा नहीं है कि मेरी राह आसान है. सागर में मिलने से पहले कई बाधाओं का सामना मुझे करना पड़ता है. लेकिन मैं निडर हूँ, सभी बाधाओं का बड़े ही साहस के साथ सामना करती हूँ और अपनी उत्पत्ति के उद्देश्य को पूरा करती हुई सागर में जा मिलती हूँ. मैं अपनी राह स्वयं बनाती हूँ. किसी की मदद नहीं लेती हूं. मात्र परोपकार ही मेरी उत्पत्ति का एकमात्र उद्देश्य है

मेरे जल का उपयोग करके मनुष्य अपना जीवन यापन करता है. मैं भोजन का भी प्रमुख स्रोत हूँ. खेतों की सिंचाई, बिजली बनाना जैसे कार्य मनुष्य मेरे जल से ही करता है

मेरा जल पशु-पक्षी, जीव-जंतुओं सभी के लिए अति आवश्यक है. मैं पर्यावरण में पारितंत्र का संतुलन हमेशा बनाए रखती हूं. मैं सृष्टि के संचालन में मददगार हूँ

मेरे जल के बिना मनुष्य का जीवन नामुमकिन सा है. फिर भी मनुष्य विकास की दौड़ में इतना अंधा हो गया है कि मुझी को दूषित करता जा रहा है

मनुष्य उद्योग, धंधे अपने लाभ के लिए करता है और अपशिष्ट पदार्थ मेरे जल में डाल देता है. कभी दूषित पानी, कभी औद्योगिक कचरा , कभी प्लास्टिक जैसी जानलेवा वस्तुएं सब मेरे ही जल में फेंकी जाती हैं. यह सब मेरे निर्मल और स्वच्छ जल को दूषित कर रहे हैं

मेरी भी भावनाएं और एहसास हैं. जो आहत होते हैं पर मैं कुछ कह नहीं पाती, मनुष्य के इन क्रियाकलापों से शायद मेरा अंत ना हो लेकिन मेरा जल एक दिन मनुष्य के लिए जहर समान बन जाएगा. तब मनुष्य भला कैसे जी पाएगा

कैसे बिन स्वच्छ जल के मनुष्य अपने जीवन को चलाएगा. यह सब सोच कर ही मुझे इतना दुख होता है और मनुष्य की मूर्खता पर दया भी आती है

मेरा सभी इंसानों से विनम्र आग्रह है कि मेरे निर्मल और साफ सुथरे जल को गंदा ना करें. मैं आपकी ही भलाई चाहती हूं. अतः मेरे जल को साफ और स्वच्छ रखने के हमेशा प्रयास करते रहें. इस जनकल्याण के कार्य में अपनी भूमिका अवश्य निभाएं

“कल कल करती बहती हूँ, सदा बहती ही रहूंगी
परोपकारी हूँ, सदा परोपकार करती ही रहूंगी”

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संक्षेप में

मुझे उम्मीद है कि आपको नदी की आत्मकथा पर निबंध जरूर पसंद आया होगा. अगर आपको यह जानकारी कुछ काम की लगी तो इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर कीजिएगा

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