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पारिस्थितिकी तंत्र या पारितंत्र क्या है संपूर्ण जानकारी

Ecosystem in Hindi : दोस्तों नमस्कार, क्या आप पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में जानना चाहते हैं कि पारितंत्र क्या है? तो यह पोस्ट आपके लिए काफी उपयोगी है

पारिस्थितिकी तंत्र और पारितंत्र दोनों एक ही चीज है आपको इसमें कंफ्यूज होने की कोई जरूरत नहीं, आइए सबसे पहले आपको पारिस्थितिकी से अवगत कराता हूं

पारिस्थितिकी जीव विज्ञान का वह भाग है जिसके द्वारा हमें जीव तथा पर्यावरण की पारस्परिक प्रतिक्रियाओं का बोध होता है. इस प्रकार विभिन्न जीवों के पारस्परिक सम्बन्धों तथा उनका भौतिक पर्यावरण से सम्बन्धों का अध्ययन पारिस्थितिक विज्ञान (Ecology) के अन्तर्गत किया जाता है. पारिस्थितिकी को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है

  • पारिस्थितिकी पर्यावरण के सम्बन्ध में जीवों के अन्तः सम्बन्धों का अध्ययन है.
  • पारिस्थितिकी वह विज्ञान है, जिसमें जीवों का उनके पर्यावरण और दर्शन, जिसमें सांसारिक जीवन को प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा विश्लेषित किया जाता है, के सम्बन्धों का पता लगाया जाता है.
  • पारिस्थितिकी प्रकृति की सरचना व कार्य का अध्ययन है.
  • पारिस्थितिकी को मानव व वातावरण की समग्रता का विज्ञान कहा जाता है.

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि पारिस्थितिकी जीवों के निवास स्थानों एवं वातावरणों का अध्ययन है. इसके अन्तर्गत जीवों के चारों ओर विद्यमान उन भौतिक दशाओं की विवेचना की जाती है जो जीवों पर प्रभाव डालती है और स्वयं प्रभावित होती है. तो आइए जानते हैं पारितंत्र किसे कहते हैं?

पारिस्थितिकी तंत्र या पारितंत्र क्या है – Ecosystem in Hindi

paritantra kya hai

 

पारितंत्र की परिभाषा (Definition of Ecosystem in Hindi) → किसी स्थान विशेष में पाए जाने वाले जैविक तथा अजैविक घटकों के पारस्परिक संबंधों को सामूहिक रूप से पारितंत्र या पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं. पारितंत्र के अंतर्गत जैविक तथा अजैविक घटकों का अध्ययन किया जाता है

पारितंत्र के घटक – Components of Ecosystem in Hindi

  • सजीव या जैविक घटक
  • निर्जीव या अजैविक घटक

1. सजीव या जैविक घटक किसे कहते हैं?

स्थल, जल और वायुमण्डल में निवास करने वाले सभी प्रकार के जीव-जन्तु, जीवाणु, कीटाणु आदि तथा सभी प्रजातियों के पेड़-पौधे (वनस्पति) जैव घटक के अन्तर्गत सम्मिलित किए जाते हैं यानी ऐसे घटक जोकि जीवित है जैविक घटक के अंतर्गत आते है

समस्त जंतु एवं पौधे जीवमंडल में जैविक घटक के रूप में पाए जाते हैं. जैविक घटक को उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक तीन भागों में विभाजित किया गया है

उत्पादक किसे कहते हैं ?

जैविक संघटकों में उत्पादकों का विशेष महत्त्व है. उत्पादक अपना भोजन स्वयं बनाते हैं इसलिए इनको स्वपोषी भी कहा जाता है. सभी प्रकार के पादप उत्पादकों के अन्तर्गत आते हैं

ये सूर्य की उपस्थिति में अपने शरीर के हरे भागों में कार्बन डाइऑक्साइड और जल जैसी सामग्रियों का उपयोग कर प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा क्लोरोफिल नामक पदार्थ का निर्माण करते हैं

दूसरे शब्दों में, ये वनस्पतियाँ सूर्य के प्रकाश को ऊर्जा में परिवर्तित कर अपने पोषण तत्त्वों को प्राप्त करती रहती हैं. इसी कारण पारितन्त्र में उत्पादकों का जैवभार सर्वाधिक होता है और ये दूसरों के लिए भोजन का कार्य करते हैं

उपभोक्ता किसे कहते हैं ?

पारितन्त्र के वे जीव जो अपने भोजन के लिए दूसरे जीवों (उत्पादक एवं द्वितीयक व तृतीयक उपभोक्ता) पर निर्भर होते हैं उपभोक्ता कहलाते हैं. अन्य जीवों पर आश्रित होने के कारण उपभोक्ताओं को परपोषी या परभक्षी कहा जाता है

उपभोक्ता सामान्यतः चार प्रकार के होते हैं –

  • प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता या शाकाहारी
  • द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता या मांसाहारी
  • तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता या सर्वाहारी
  • अपघटक या अपरदभोजी उपभोक्ता

प्रथम श्रेणी के उपभोक्ता - वे जीव, जो अपना भोजन केवल पेड़-पौधों, घास, तृणमूल आदि से प्राप्त करते हैं शाकाहारी या प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं. उदाहरण के लिए - हिरन एवं खरगोश शाकाहारी या प्राथमिक उपभोक्ता हैं

द्वितीय श्रेणी के उपभोक्ता - जो जीव अन्य जीवों का भक्षण करते हैं वे मांसाहारी या गौण उपभोक्ता कहलाते हैं. उदाहरण के लिए - शेर एवं चीता मांसाहारी उपभोक्ता हैं ये मांसाहारी उपभोक्ता - शाकाहारी उपभोक्ता अथवा अन्य जीवों को मारकर अपना भोजन प्राप्त करते हैं

तृतीय श्रेणी के उपभोक्ता - ऐसे जीव जो जन्तुओं और पेड़-पौधों दोनों से ही अपना भोजन प्राप्त करते हैं सर्वाहारी या सर्वभक्षी उपभोक्ता कहलाते हैं. मनुष्य इसका उत्तम उदाहरण है क्योंकि वह शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों ही प्रकार का भोजन करता है

अपघटक या अपरदभोजी उपभोक्ता - कुछ ऐसे जीव जो सड़े-गले पौधों एवं पदार्थों तथा मृत जीव जन्तुओं के ऊतकों का विघटन या अपचयन कर अपना भोजन प्राप्त करते हैं, अपघटक या अपरदभोजी उपभोक्ता कहलाते हैं. जीवाणु, कवक, दीमक, केंचुए और मैगट ऐसे ही विघटक जीव हैं

अपघटक किसे कहते हैं ?

पारितन्त्र में मौजूद सूक्ष्म जीव विघटक या अपघटक कहलाते हैं. मृत जीवों पर आश्रित होने के कारण इनको मृतपोषी भी कहते हैं. विभिन्न प्रकार के जीवाणु, कवक आदि इसके मुख्य उदाहरण हैं. जीवाणु प्राय: जानवरों के ऊतकों पर और कवक पौधों पर सक्रिय रहते हैं

इस प्रकार उत्पादकों एवं उपभोक्ताओं का यह चक्र पूर्ण हो जाता है. अपघटक जीव, जैव पदार्थों को अजैव पदार्थों में परिणत कर देते हैं. पुनः इन अजैव पदार्थों को सौर ऊर्जा की सहायता से पेड़-पौधे अपना भोजन बना लेते हैं. इस प्रकार यह क्रम अबाध गति से चलता रहता है तथा यह चक्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है

उत्पादक तथा उपभोक्ता में अन्तर

उत्पादक

उपभोक्ता

उत्पादक वे जीव हैं, जो भौतिक पर्यावरण से अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं

उपभोक्ता ऐसे जीव हैं, जो अपने भोजन के लिए दूसरे जीवों पर आश्रित रहते हैं

इन्हें स्वपोषी जीव कहते हैं

इन्हें परपोषी जीव कहा जाता है

इसके अन्तर्गत हरे पौधे तथा जीवाणु आदि महत्त्वपूर्ण होते हैं

इसके अन्तर्गत प्राणी, पशु-पक्षी और अपघटक आदि सम्मिलित होते हैं

उत्पादक सौर ऊर्जा की सहायता से अजैव पदार्थों को जैव पदार्थों में परिणत कर देते हैं

उपभोक्ता शाकाहारी और मांसाहारी दोनों ही प्रकार के होते हैं

सौर ऊर्जा की सहायता से जैव पदार्थों का संश्लेषण किया जाता है

उपभोक्ता पौधों और जीवों दोनों से ही अपने भोजन की प्राप्ति करते हैं

2. निर्जीव या अजैविक घटक किसे कहते हैं?

मृदा, जल और वायुमण्डल में विद्यमान अनेक रासायनिक पदार्थ अजैव घटक कहलाते हैं. इन रासायनिक पदार्थों में जल, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइ-ऑक्साइड, कैल्सियम, फॉस्फोरस तथा अन्य अनेक रासायनिक पदार्थ सम्मिलित किए जाते हैं

भौतिक पर्यावरण के अजैव घटक किसी क्षेत्र में निवास करने वाले जीव-जन्तुओं तथा वनस्पति की विभिन्न प्रजातियों को प्रभावित करते हैं. अजैव घटकों में जलवायु का महत्त्वपूर्ण स्थान है, जो सम्पूर्ण पारिस्थितिक तन्त्र को प्रभावित करती है तथा उसमें अनेक परिवर्तन लाती है

यूं समझे कि अजैविक घटक के अंतर्गत निर्जीव वातावरण आता है. जो विभिन्न जैविक घटकों का नियंत्रण करता है. अजैविक घटक को अकार्बनिक, कार्बनिक, भौतिक तीन उप घटकों में विभाजित किया गया है

  • अकार्बनिक घटक
  • कार्बनिक घटक
  • भौतिक घटक

अकार्बनिक घटक

अकार्बनिक घटक के अंतर्गत पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फेट, लोहा, सल्फर, आदि के लवण, जल तथा वायु की गैस जैसे – ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, अमोनिया आदि आती है

कार्बनिक घटक

कार्बनिक घटक के अंतर्गत कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा आदि सम्मिलित है. ये मृतक जंतु एवं पौधों के शरीर से प्राप्त होते हैं. अकार्बनिक एवं कार्बनिक भाग मिलकर निर्जीव वातावरण का निर्माण करते हैं

भौतिक घटक

भौतिक घटक के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के जलवायवीय कारक जैसे वायु, प्रकाश, ताप, विद्युत आदि आते हैं

पारितंत्र के प्रकार – Type of Ecosystem in Hindi

वास्तव में हमारी पृथ्वी स्वयं एक वृहद् पारितंत्र है, जिसमें विभिन्न प्रकार के पारितंत्र क्रियाशील रहते हैं. लघु स्तर पर एक गाँव, एक आवासीय परिसर, एक झील, नदी या तालाब आदि का भी अपना पारितंत्र होता है

प्रत्येक प्रकार के पारितंत्र में भौतिक अवस्थाओं की विविधताएँ एवं विभिन्न प्रकार के जीवों के विशिष्ट अन्तर्सम्बन्ध पाए जाते हैं. इस दृष्टि से विभिन्न प्रकार के पारितन्त्रों का सामान्य परिचय और विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. वन पारितंत्र

वृक्षप्रधान प्राकृतिक पौधों के समुदायों को वन कहा जाता है. वन पारितन्त्र को जीवोम (Biom) भी कहा जाता है. वन पारितन्त्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • वन पारितंत्र में कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ मृदा एवं में वायुमण्डल में विद्यमान होते हैं
  • इस पारितंत्र में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे उत्पादक के रूप में होते हैं
  • वन पारितन्त्र में तीन प्रकार के उपभोक्ता पाए जाते हैं – प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक
  • वन पारितन्त्र में अनेक प्रकार के छोटे-छोटे सूक्ष्म जीव होते हैं इनमें कवक और जीवाणु तथा एक्टीनोमाइसीट (कवक और जीवाणु के बीच के जीव) पाए जाते हैं

2. घास भूमि पारितंत्र

पृथ्वी के उन भागों में जहाँ शीतकाल काफी ठण्डा और ग्रीष्मकाल काफी गर्म होता है वहाँ घास भूमि पारितंत्र की प्रधानता होती है. स्थलीय भाग के लगभग 24% भाग पर घास भूमि का विस्तार पाया जाता है. घास भूमि पारितंत्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • इस पारितंत्र में वृक्षों की उपस्थिति अल्प मात्रा में पाई जाती है. यहाँ कुछ झाड़ियों वाले पौधे एवं विभिन्न प्रकार की घास उत्पादक के रूप में मिलती है
  • घास भूमि पारितंत्र में भी तीनों प्रकार के उपभोक्ता होते हैं. प्राथमिक उपभोक्ताओं में यहाँ गाय, भैंसा, हिरण, भेड़ें, खरगोश, चूहे आदि घास खाने वाले जीवों की प्रधानता होती है
  • घास भूमि पारितंत्र में वियोजक के रूप में अनेक प्रकार के कवक और जीवाणु पाए जाते हैं

3. मरुस्थलीय पारितंत्र

पृथ्वी पर जहाँ 25 सेमी से कम वर्षा होती है उन क्षेत्रों में मरुस्थलीय वन पारितंत्र का विकास होता है. मरुस्थलीय पारितन्त्र की प्रमुख विशेषताओं का विवरण इस प्रकार है

  • इस पारितन्त्र में कम वर्षा तथा उच्च तापमान मिलता है. मरुस्थलीय पारितन्त्र में अपक्षय शक्तियों की प्रबलता होती है अत: रेतीली मिट्टी का निर्माण अधिक होता है
  • मरुस्थलीय पारितन्त्र में उत्पादक के रूप में चार प्रकार के पादपों की पहचान की जाती है
    • वार्षिक पौधे – जिसमें अनेक प्रकार की घास उत्पन्न होती है
    • मरुस्थलीय झाड़ियाँ – जिनके पत्ते शुष्क मौसम में झड़ जाते हैं
    • मांसल तने वाले पौधे – जैसे – कैक्टस
    • सूक्ष्म वनस्पति – जिसमें लाइकेन तथा नीली हरित शैवाल आदि सम्मिलित होती है
  • मरुस्थलीय पारितन्त्र में उपभोक्ताओं के रूप में अनेक प्रकार के कीट, पूर्वानुकूली जीव तथा सरीसृप मिलते हैं. इनमें साँप, कुतरने वाले जीव तथा ऊँट प्रमुख हैं
  • शुष्क या मरुस्थलीय पारितन्त्र में अपघटन क्रिया कम होती है. इसका मुख्य कारण शुष्क जलवायु व जीवों तथा वनस्पति का अभाव है फिर यहाँ कुछ मात्रा में उष्णजीवी कवक और जीवाणु पाए जाते हैं

4. जलीय पारितन्त्र

जलीय पारितन्त्र अनेक प्रकार के होते हैं. इनमें लघु स्तर पर झील, तालाब, नदियाँ आदि. मृदुल जलीय पारितन्त्र तथा वृहत स्तर पर खाड़ी सागर, महासागर आदि पारितन्त्र देखे जाते हैं

संक्षेप में

दोस्तों उम्मीद है आपको बताई गई जानकारी पारितंत्र क्या है – Ecosystem in Hindi जरुर पसंद आई होगी. अगर आपको यह जानकारी कुछ काम की लगी तो इसी शेयर जरूर कीजिएगा. अगर आप ऐसी जानकारियों में रुचि रखते हैं तो MDS BLOG के साथ जरूर जुड़े MDS BLOG से जुड़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

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