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श्रवण कुमार की कहानी

Shravan Kumar ki Kahani : दोस्तों क्या आप भी है इच्छुक और पढ़ना चाहते हैं श्रवण कुमार की कहानी तो आज मैं आपको एक पौराणिक कथा के बारे में जानकारी दूंगा जिसमें की एक पुत्र की अपने माता-पिता के कर्तव्य प्रति प्रेम और सम्मान भावना का उद्धार है

नमस्कार दोस्तों MDS Blog से मैं सुमित आज आपको श्रवण कुमार की कहानी (Shravan Kumar ki Kahani) से रूबरू कराऊंगा. तो आइए जानते हैं

श्रवण कुमार की कहानी – Shravan Kumar Story in Hindi

Shravan Kumar ki Kahani, श्रवण कुमार की कहानी, Shravan Kumar Story in Hindi

बहुत समय पहले, श्रवण कुमार नाम का एक लड़का रहता था. वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि उसके माता-पिता दोनों अंधे थे. उसे अपने माता-पिता की देखभाल करनी पड़ती थी और दिन भर घर के सभी काम करने पड़ते थे

चूंकि उसके माता-पिता नहीं देख पाते थे, इसलिए श्रवण को उनके लिए सारा काम करना पड़ता था. वह एक बहुत ही जिम्मेदार पुत्र था और अपने माता-पिता के सभी कार्यों को पूरी उत्सुकता और जिम्मेदारी से करता था. उसके माता-पिता की कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रही क्योंकि उसने हमेशा अपने माता-पिता की हर इच्छा को पूरा करने की पूरी कोशिश की

श्रवण ने अपने माता-पिता की खूब सेवा की, एक दिन उसके माता-पिता ने उससे तीर्थ-यात्रा पर जाने की अपनी अंतिम इच्छा प्रकट की यह सुनकर श्रवण बहुत प्रसन्न हुआ. वह अपने माता-पिता की इच्छा को पूरा करना चाहता था

इसलिए उसने एक डंडे पर दो टोकरियाँ लटकाई और एक कांवड़ बनाकर उसमें बिठाकर वह अपने माता-पिता को अपने कंधों पर उठाकर तीर्थ यात्रा कराने के लिए निकल पड़ा. वह अपने माता-पिता को कई तीर्थ स्थलों पर ले गया

वह उन्हें अपने द्वारा देखे गए दृश्यों के बारे में बताता था, उसके माता-पिता तो नेत्रहीन थे पर ये पूरी यात्रा वे अपने पुत्र श्रवण के नेत्रों से कर रहे थे. यात्रा करते-करते एक दिन वे अयोध्या के पास एक जंगल में पहुँचे

श्रवण के माता-पिता को बहुत प्यास लगी और उन्होंने श्रवण से अपनी प्यास बुझाने के लिए कुछ पानी लाने को कहा. श्रवण अपने माता-पिता को जंगल में एक पेड़ के पास छोड़कर उनके लिए पानी की खोज में चला गया

चलते-चलते उसे एक नदी दिखाई दी वो पानी भरने उस नदी के तट पर गया. उस समय अयोध्या के राजा दशरथ हुआ करते थे और वे शिकार में बहुत अच्छे थे. उस दिन भी वे जंगल में शिकार करने निकले थे

सुबह से जंगल मे भटकने के बाद भी उन्हें कोई शिकार नहीं मिला. राजा दशरथ के पास ‘शब्दभेदी बाण’ चलाने की कला थी. वे बिना देखे, केवल किसी आहट को सुनकर उस पर निशाना लगा सकते थे

श्रवण ने पानी इकट्ठा करने के लिए बर्तन को डुबोया और जिससे आवाज आई. आवाज सुनकर दशरथ ने इसे हिरण के पानी पीने की आवाज समझ लिया. जहां से आवाज आ रही थी, उन्होंने उस दिशा में अपना शब्दभेदी बाण चला दिया और वह बाण सीधे श्रवण कुमार के सीने में जा लगा. वह असहनीय दर्द से चिल्लाया और अंत में जमीन पर गिर पड़ा

जब श्रवण के कराहने की आवाज दशरथ के कानों तक पहुंची तो वह फौरन वहाँ पंहुचे. पहुंचकर उन्होंने देखा कि कोई मासूम व्यक्ति असहनीय दर्द से कराह रहा है. राजा दशरथ को यह अहसास हो गया कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो चुकी है. वे स्वयं को कोसने लगे और श्रवण से क्षमा मांगने लगे

श्रवण ने राजा को देखा और काँपते स्वर में उनसे कहा कि आप मेरी चिंता मत कीजिये, मुझे मेरी मृत्यु का कोई दुःख नहीं है. उसने राजा दशरथ को बताया कि वह अपने प्यासे माता-पिता के लिए पानी लेने नदी पर आया था

उसने राजा से अनुरोध किया कि वे उसके प्यासे माता-पिता तक यह पानी पहुंचाकर उनकी प्यास बुझा दें और साथ ही उसकी मृत्यु का संदेश भी उन तक पहुंचा दें. यह कहकर श्रवण कुमार ने अपने प्राण त्याग दिए

राजा दशरथ पानी लेकर श्रवण के माता-पिता के पास पंहुचे और उन्हें सारी घटना सुनाई. यह सब सुनकर वे अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जिस तरह से हम अपने पुत्र के वियोग में तड़प रहे हैं ठीक उसी तरह एक दिन तुम भी अपने पुत्र के वियोग में तड़पोगे

उनके इसी श्राप के चलते श्री राम को 14 वर्ष का वनवास भुगतना पड़ा और राजा दशरथ की उनके वियोग में तड़पने से मृत्यु हो गयी

⬆ इस कहानी से सीखने योग्य बातें ⬇

1. हमें अपने माता-पिता की सदैव सेवा करनी चाहिए
2. हमें अपने से बड़ो की आज्ञा का पालन करना चाहिए
3. खराब समय में हमेशा अपनों का साथ देना चाहिए

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